सोमवार, 17 अगस्त 2009

पैसा और मनुष्य की पहचान-- अंशु पवार

इंसान पैसे की दौड़ में इतनी तेजी भाग रहा है की उसकी असली पहचान कहाँ छुट गयी है इसका एहसास शायद उसे भी नही है। इस तेज भागती जिंदगी से कदम मिलाकर चलना एक हठ सी बन गयी है। एक हठ जिसमें उसके अपने, उसके सपने और उसका बचपन किस मोड़ पर छुट गया है इसका तो इलम भी उसे नही हो रहा है। धर्म-अधर्म और पैसा आज एक इंसान से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। इसके लिए इंसान को अगर किसी की जान भी लेनी पड़े तो इंसान पीछे नही हटेगा। मनुष्य की पैसे की भूख इस कदर बढती जा रही है जैसे हिंदुस्तान की जनसँख्या। इंसान की असली पहचान मनो इस पैसे ने अपने निचे दबा सी ली हो, या यूँ कहें की इंसान ने ख़ुद अपनी पहचान इस पैसे के पीछे छुपा ली हो।

सब एक ही बात कहते सुनायी देते है, "हमें अपनी एक अलग पहचान बनानी है"। पहचान!! वो पहचान उसे मिल तो जाती है मगर उस पहचान में वो अपने आपको अकेला ही पाता है। ऐसी पहचान का मतलब ही क्या, जो उसे अपनों से दूर कर दे।

शहीद भगत सिंह, महात्मा गाँधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू कुछ ऐसे ही प्रख्यात हस्तियां है जिनके विचार और कर्म उनकी पहचान बनी। जिसमें न ही उनके अपनों ने, बल्कि पुरे हिंदुस्तान ने साथ दिया। इन हस्तियों ने अपनी सिर्फ़ एक ही पहचान इस विश्व को दी, वो थी- "हम हिन्दुस्तानी है" । देशभक्ति का जज्बा जनों बन कर उनकी लहू में बहता था। इन सभी का एक ही सपना था- एक सशक्त भारत।

लेकिन अब इस शशक्त भारत में मनुष्य के कर्म और विचारों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है-"पैसा" जिसने एक हिंदुस्तान में न जाने कितने हिंदुस्तान बना दिए है। अब मनुष्य सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसे के ही साथ कुश रहता है और अपनों से कहता है---
p
----------------पास

A-------------अपने
I
--------------इजाजत
S
------------सेअ

A-----------आना


Written By- Anshu Pawar