बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

सचिन सचदेवा की कलम से..

अरमानो का जगाना हमें आता है,
उन्हें पूरा का दिखाना भी आता है,
लेकिन जब हौसले हो बुलंद, और इरादे हो पक्के,
तो मंजिलों को पाना हर कोई जनता है.

शायरों में छोटे-मोटे शायर हम भी जाने जाते है,
कसूर कहो या किस्मत, हमारी नहीं,
मेरे इन हाथों की है,
दर्द से कुछ न कुछ लिखे जाते है,
और दूसरो के दिल में एक छाप छोड़ जाते है.

हम आपको पाकर खोना नहीं चाहते,
जुदाई में आपके रोना नहीं चाहते,
आप हमारे ही रहना हमेशा,
क्यूंकि हम भी किसी और के होना नहीं चाहते.


सचिन सचदेवा की कलम से..
धन्यबाद

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